संत कबीर जी और मगहरMaghar · Sant Kabir Nagar

संत कबीर जी · वाणी

कबीर की वाणी

कबीर की वाणी मुख्यतः तीन बड़ी ग्रंथ-परंपराओं के माध्यम से हम तक पहुंची है — बीजक (काशी/कबीर चौरा परंपरा), कबीर ग्रंथावली (राजस्थानी परंपरा) और कबीर सागर (धर्मदासी परंपरा)। इन सबका मूल स्वरूप मौखिक था, जिसे बाद में लिपिबद्ध किया गया।

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बीजक

बीजक को तीन भागों में बांटा गया है — रमैनी, शब्द और साखी। यह ग्रंथ पाठक को भ्रम, पाखंड और रूढ़िवाद त्यागकर सत्य के सीधे अनुभव की ओर प्रेरित करता है।

कबीर ग्रंथावली एवं साखी ग्रंथ

यह राजस्थानी परंपरा में संकलित कबीर वाणी का संग्रह है, जो साखियों (उपदेशात्मक दोहों) और पदों के रूप में सुरक्षित है।

गुरु ग्रंथ साहिब में कबीर वाणी

कबीर के अनेक पद सिख धर्मग्रंथ आदि ग्रंथ/गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित हैं — यह उनकी वाणी की व्यापक, बहु-धार्मिक स्वीकार्यता का प्रमाण है।

सत्य और आत्मज्ञान पर

चाह मिटी, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह। जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह शहंशाह।।

जब इच्छाएं मिट जाती हैं, तो चिंताएं भी समाप्त हो जाती हैं और मन निश्चिंत हो जाता है। कबीर कहते हैं कि जिसे कुछ भी नहीं चाहिए, वही सच्चा राजा है — सच्चा संतोष ही सबसे बड़ा वैभव है।

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।।

सच्चा साधु सूप (अनाज फटकने का पात्र) के समान होना चाहिए, जो सार (अच्छे अनाज) को रख लेता है और थोथा (भूसा) उड़ा देता है। इसी तरह विवेकवान व्यक्ति सत्य और सार को ग्रहण करता है, व्यर्थ को त्याग देता है।

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

अपनी निंदा करने वाले को पास ही रखो, यहां तक कि उसके लिए आंगन में कुटिया बनवा दो। क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के भी तुम्हारे स्वभाव को निर्मल कर देता है — आलोचना आत्म-सुधार का अवसर बन सकती है।

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।

जिन्होंने गहरे पानी में उतरकर खोजा, उन्हें ही सत्य मिला। कबीर कहते हैं कि मैं डूबने के डर से किनारे बैठा रह गया। सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए गहन और साहसिक खोज आवश्यक है, सतही प्रयास पर्याप्त नहीं।

कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढ़े वन माहिं। ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाहिं।।

कस्तूरी मृग की अपनी नाभि में ही होती है, पर वह उसे वन में ढूंढता फिरता है। वैसे ही ईश्वर प्रत्येक हृदय में विद्यमान है, पर संसार उसे बाहर खोजता रहता है। सत्य भीतर है, बाहर नहीं।

प्रेम और भक्ति पर

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।

बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़कर भी संसार में कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बन पाया। कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति 'प्रेम' के ढाई अक्षर पढ़ और समझ ले, वही वास्तव में विद्वान और ज्ञानी है — शास्त्रीय ज्ञान से बढ़कर प्रेम की अनुभूति है।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।।

हाथ में माला फेरते-फेरते युग बीत गया, पर मन की फिरन (भटकाव) नहीं बदली। कबीर कहते हैं कि हाथ की माला छोड़कर मन की माला फेरो — बाहरी कर्मकांड से अधिक महत्वपूर्ण है भीतर का परिवर्तन।

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।।

दुख में तो सभी ईश्वर को याद करते हैं, पर सुख में कोई नहीं करता। कबीर कहते हैं कि यदि व्यक्ति सुख में भी ईश्वर का स्मरण करे, तो दुख आए ही क्यों। सच्ची भक्ति शर्तों पर आधारित नहीं होनी चाहिए।

मानवता और समानता पर

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।

किसी साधु या सज्जन की जाति मत पूछो, उसका ज्ञान पूछो। जैसे तलवार का मोल उसकी धार से होता है, म्यान से नहीं — वैसे ही मनुष्य का मूल्य उसके गुण और ज्ञान से है, जन्म से नहीं।

तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँवन तर होय। कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।।

पैरों तले पड़े एक छोटे तिनके को भी कभी तुच्छ मत समझो। यदि वही तिनका उड़कर आंख में पड़ जाए, तो बहुत पीड़ा देता है। कोई भी व्यक्ति या वस्तु, चाहे कितनी छोटी लगे, उसका अनादर नहीं करना चाहिए।

कबीरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर। ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।।

कबीर बाज़ार में खड़े होकर सबकी भलाई मांगते हैं — न किसी से विशेष मित्रता, न किसी से शत्रुता। यह दोहा समभाव और सार्वभौमिक शुभकामना का संदेश देता है, जो कबीर की मानवतावादी दृष्टि का केंद्र है।